अस्वीकृत सहानुभूति और अन्य कविताएं



-1-

अस्वीकृत  सहानुभूति 
                                                                           - गौरांग

फिर कहता हूँ एक बार
ये सहानुभूति की टूटी बैसाखी
हर रोज जो थमाते हो तुम
वह हरगिज स्वीकार नहीं है मुझे



आखिर कब तक देखते रहोगे तुम
मेरे कटे हुए पैरों को
मेरे पास एक प्रबुद्ध मानस भी है
जिसकी बदौलत
मैं बना रहा हुँ अपना स्थान
जिंदगी के इस भीड भरे प्लेट्फार्म में

कोई फर्क नहीं पडता
जो खो दी हैं मैंने
 अपनी दोनो टांगे
कम से कम अब
नहीं शामिल हो पाऊँगा
तुम्हारी उस
दो टांगो वाली  वहशी भीड में
जो काट खाने को तत्पर है
हर उस इंसान को
जो धर्म और राजनीति के दलदल
 से दूर होना चाहता है
बैसाखी के छोटे ड़ड़ों में
मिल गया मुझे
व्यापक आधार
एक विशाल समाज

ठीक है
नहीं दे सकते तुम
पूरे विश्व को व्यापक आधार
वर्जनाओं से मुक्त समाज
पर
मुझसे  तो मत छीनो
मेरे विकलांग समाज का सम्मान बोध
अपनी निरर्थक सहानुभूति से


-2-

पहियों वाली कुर्सी
                                                                               - गौरांग
ओ री ओ
मेरी दो पहियों वाली कुर्सी
कब तक मुझको
कहां कहाँ तक  ले जायेगी

आहत मैं पैरों की ताकत
                         खो कर तुझ पर बैठ गया हूँ    
खट खट खट खट

धीरे-धीरे खींच रहा हूँ
हाथों से पूरे शरीर को
कभी-कभी लगता है जैसे
बहुत थक  गया
जीवन की लम्बी चढ़ान में

पर तू तो
जैसे मेरे दिल में हलचल कर जाती है
भावों को आन जगाती है
 उठता मन में विश्वास
कि
शायद कर पाउं
 वो काम
अधूरे पैर मेरे जो छोड गये हैं
 तेरे हवाले

चल ले चल मुझको
पहाड  के पार
वहाँ से फिर चुन आऊँ
मुरझाये वे फूल मेरी आशाओं के
जो सपनों की माला से
झड़ कर बिलख रहे हैं



-3-

बंद कर दो खिडकियां
और
आफ कर दो स्विच
कि
अब मैं रोशनी से दूर जाना चाहता हूँ


-4-

बाटूंग़ा तुम्हारी पीड़ा
दूँगा मैं तुम्हें मुस्कान
हमारा स्वप्न
तुम्हारे घावों से निकला है


-6-

टूटती आस
                                                               - गौरांग

तुम्हारी पीठ
कि
जिसमें हरदम
होते रहते हैं घाव
कठिन … कभी ना भरने वाले

तुम्हारे पैर
जिन्होंने कर दिया है
चलने से इन्कार

तुम्हारे शरीर की सुहानी खुशबू
जिसे
प्रतिपल छीन रही है
अनवरत
निकलने वाले मूत्र
की
अनिर्वचनिय गंध

प्रिय
कब तक करुँगा इंतजार
उस दिन का
जब भर जायेंगे तुम्हारे घाव और बंद होगा
अनवरत मूत्र प्रवाह
और ले आयेंगे पैर
पास मेरे वह नेह देह
जो
दुर्घटना के पहले
मेरे पास रही थी
-7-

संकल्प
                                                                           - गौरांग

प्रिय
टूट नहीं पायेगी
हमारी नेह डोर
कि
तुमने खोया है सब कूछ
सिवाय आत्म बल के
तुम जैसी हो
जहाँ हो
हो मुझे स्वीकार्य
हर  क्षण


-8-


शेयर गान


जिंदगी के गीत गुनगुना्ते जायेंगे ।
हम गाते  जायेंगे मुस्कुराते  जायेंगे॥

हमने अपनी मुश्किलें आसान की
अपनी चाहतों को एक आवाज दी
तुम हमारे साथ आओ
नाचो गाओ झूम जाओ
जम भूला के सारे अब ख़ुशियाँ मनायेंगे…॥

हम गाते  जायेंगे मुस्कुराते  जायेंगे



मुश्किलों की राह से चले थे हम
जिंदगी की आग में जले थे हम
सह लिया सब आँख में  आँसू लिये
जो मिला हमें किसी को ना मिले
दर्द की दुनिया से कहीं दूर जायेंगे
अब रुक न पायेंगे…॥

जिंदगी के गीत गुनगुना्ते जायेंगे…।
हम गाते  जायेंगे मुस्कुराते  जायेंगे…॥




-9-

तुम जरूरी हो

                                                                         - गौरांग

जरूरी हो तुम
इन्सानियत के मार से
तडपते हर उस इंसान के लिये
जिसे लगता है
जिंदगी
अब सारे अर्थ खो चुकी है

तुम्हारी जरुरत है
उसे
जिसके भावों ने
 शब्दों का
कभी नही किया स्पर्श
और
उसे
जिसकी आँखो में सपने
 बस
काले रग से ही लिखे जाते हैं

और
हर उस इन्सान को भी
जिसे लगता है
यह दुनिया
महज इंसान के जिस्म से
नहीं चलती है।

दोस्त
तुम कुछ नहीं
बस एक चाँद हो
 पुर्णिमा के संपूर्ण चाँद  
जो घिरा है  अभी
घटा टोप बादलों से
प्रतीक्षा है हम सबको
चाँद के बाहर आने की
दोस्त
चाँद क्या कभी खोता है
अपनी चांदनी?



-10-

संघर्ष

                                                                           - गौरांग

याद कभी कभी आती है
आत्माभिमान अक्सर सताता है
कब तक भोगूँ  और क्यों भोगूँ
क्या परिस्थितियां ऐसी ही रहेंगी
जीवन भर

इच्छायें पूर्ण न हो
आवश्यकताओं से जूझना ही होगा
वैयक्तिक , या पारिवारिक
अनपेक्षित या अपेक्षित
प्रश्नों का समाधान खोजना होगा
संघर्ष जारी रहे गा

सफलता या असफलता
भविष्य के हाथों में है कि
कर्म यज्ञ तो चलेगा
प्रयासों की आहूतियां पडेंगी
शरीर की उर्जा जलेगी

क्योंकि
पराजय स्वीकार्य नहीं होगी
और न ही
मृत्यु

पलायन है मृत्यु
और पराजय मृत्यु को दिया आमंत्रण

मार्ग बस एक है
प्रयास काम परिश्रम
कठोर
जब तक  कर्मेन्द्रियां   और मानस
 थक न जाये
रुक न जाये
अपने आप










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