कमर दर्द: मात्र दवाएं ही नहीं है इलाज


कमर दर्द: मात्र दवाएं ही नहीं है इलाज
                          अखौरी गौरांग सिन्हा
                     प्रोफ़ेसर , फिजियोथेरापी विभाग
                           पंजाबी विश्वविद्यालय, पटि्याला   


35 वर्षीय डा. विवेक को अपनी क्लीनिक संभालने में काफी  परेशानी हो रही 4-5 मरीज देखने के बाद उनकी कमर में अकडन भरी  पीडा शुरु हो जाती   है जिसे खत्म होने में 5-10 मिनट लग जाते हैं।  दर्द निवारक दवाओं का अत्यधिक प्रयोग करने से उनकी चिकित्सकीय बुद्धि रोकती है।  मिसेज शर्मा ने तो कमर दर्द के कारण लंबी चलने वाली पार्टियों में जाना ही छोड दिया है। हर तीसरे चौथे दिन उन्हें दर्द निवारक मलहम के साथ देखा जा सकता है  ।

कमर का दर्द एक आम समस्या है और इससे प्रभावित लोगों की संख्या मे लगातार वृद्धि होती जा रही है। चिकित्सा पत्रिकाओं में प्रकाशित शोधपत्रों के अनुसार तकरीबन 3- से 40 प्रतिशत लोग कमर दर्द से प्रभावित होते हैं जिसमें 5-10% मरीज कमर दर्द के कारण विकलांगों जैसा जीवन बिताने को मजबूर हैं।  इतनी बढी संख्या मे लोगों को प्रभावित करने वाली इस समस्या के बारे में एक आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि अधिकतर मामलों में कमर दर्द का मूल कारण ( डायग्नोसिस ) अत्यधिक अस्पष्ट होता है। एक्स- रे , एम आर आइ आदि परीक्षण रीढ में आये संरचनात्मक विकारों की सही जानकारी तो अवश्य देते हैं मगर बहुधा रोगी के लक्षणों का इन परिवर्तनों से कोई खास संबंध नहीं होता है ।  कुछ बीमारियों  यथा  एंकाइलोजिग स्पोडीलैटिस  ,स्लिप डिस्क , लिश्थेसिस , ट्यूमर, टीबी , गंभीर चोट आदि को छोड दें  तो अधिकांश मामलों में कमर दर्द  गलत मुद्रा , काम करने के ढंग , तनाव पूर्ण जीवन शैली, शरीर मे लचक और शक्ति की कमी आदि कई कारकों का मिश्रित परिणाम होती है ।

पुराने कमर दर्द का इलाज एक चुनौती बनती जा रही है। विश्राम , दर्द निवारक दवएं ,फिजियोथेरापी की मशीनें और व्यायाम  तेज कमर दर्द में आराम  पहुँचाते है। कुछ ही मामलों में शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पडती है। मगर सही मायनों मे देखा जाय तो तकरीबन 50% लोगों मे यह समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं होती है  । थोडी बहुत अकडन और दर्द हमेशा बना रहता है जो समय के साथ साथ बढता घटता रहता है । इस स्थिती का मुख्य कारण  है  अधूरा इलाज  और रीढ की हड्डी का दुरुपयोग  ।

मानव शरीर में रीढ का मुख्य कार्य है गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध शरीर को सीधा रखना तथा हाथ पैर की गति को आधार प्रदान करना। इसके अलावा रीढ के भीतर अवस्थित मेरुरज्जु  और स्नायुओं की सुरक्षा भी स्वयं रीढ को ही  करनी पडती है। 32 छोटी-छोटी कशेरुकाओं से बनी रीढ में  चार  वक्रताएं होती हैं। यानी कि   सीधी रीढ वास्तव में एकदम सीधी नहीं होती  ।यह वक्रता रीढ को संरचनात्मक दृढता  प्रदान करती है । विकास के क्रम में चौपाये से दुपाये हो कर मानव ने बेशक बहुत कुछ हासिल किया मगर इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पडा रीढ की मांसपेशियों को जिन्हे कभी भी पूरा विश्राम  नही मिल पाता। शरीर के अन्य भागों कि पेशीयां तो कुछ ही समय के लिये काम करती हैं मगर रीढ़ की  पेशियों को तो रात के 8 घंटों के  अलावा शरीर पर लगते गुरुत्व बल से हमेशा जूझना  पडता है।  गुरुत्व बल और मांस पेशियों के इस अनवरत संघर्ष में पेशियों का भारी पडना बहुत जरुरी है अन्यथा न तो 32 हड्डियां पने स्थान पर रह पायेंगी और न ही कोमल लिगामेंट और स्नायुओं की सुरक्षा  हो पायेगी। इसीलिए रीढ की  मांसपेशियां अपेक्षा कृत अधिक शक्तिशाली होती भी हैं। मगर कम शारीरिक श्रम और कमर दर्द इन पेशियों को दुर्बल बना देता है । प्रत्येक दो हड्डियों के बीच एक जेली से भरी थैली होती है जिसे डिस्क कहते हैं। डिस्क रीढ में शाक एबजार्बर का काम करती है जिससे रीढ पर लगने वाला वाह्य और आंतरिक बल सभी अवययों में  समान रुप से वितरित हो जाता है।
कोई भी ऐसी स्थिती जो बल के समान वितरण में बाधा उपस्थित करती है रीढ के किसी एक भाग में असामान्य दबाव  और तनाव उत्पन्न करती है जिससे रीढ के कोमल तंतुओं को आघात पहुँचता है जिसकी सूचना  मस्तिष्क को दर्द के माध्यम  से मिलती है  । मांसपेशियों की दुर्बलता, जोडों की अकडन , एक ही मुद्रा का लगातार उपयोग , रीढ पर गुरुत्वाकर्षण  का अत्यधिक प्रभाव आदि कारक रीढ पर बल के असामान्य वितरण  को बढावा देते हैं । 

रीढ की किसी बिमारी या चोट के बाद  मांसपेशियों में कमजोरी और जोडों में अकडन का आना स्वाभाविक  है । अगर व्यायामों  के द्वारा इनकी शक्ति वापस नहीं लायी गयी  तो शरीर को सीधा रखने के प्रयास का सारा बल लिगामेंटस,  जोडों की सतह और डिस्क पर पडता है,  जिससे उनके क्षति ग्रस्त होने की संभावना बढ जाती है। जोडों की अकडन अपने आप में भी पीडादायक होती है और इसके कारण  सामान्य क्रियाएं भी असामान्य ढंग से करनी पड ती हैं जो बल के असामान्य वितरण  को बढावा देती हैं। 



 


अतः कमर दर्द को दुबारा ना होने देने के लिये यह अति आवश्यक है कि दर्द की प्रारंभिक चिकित्सा यथा दवा, सिंकाई ,खिँच  (ट्रैक्सन)  आदि के तुरंत बाद  दुर्बल मांसपेशियों  और अकडे हुए जोडों को पुरानी अवस्था में लाने के प्रयास किये जाएं । यह कार्य मात्र चिकित्सकीय व्यायामों के द्वारा ही संभव है। दवाओं  से न तो पेशियों की ताकत बढती है और ना ही जोडों की अकडन दूर होती है ।  हाँ दर्द निवारक दवाओं का अत्यधिक प्रयोग  गैस, एसिडिटी पेप्टिक अल्सर आदि बिमारियों को निमंत्रण अवश्य देता है ।  
अकसर यह देखने में आता है कि मरीज एक दूसरे के व्यायाम की नकल करने लगते हैं  ।यह जानना बहुत आवश्यक है कि कोई भी एक व्यायाम कमर दर्द के सभी रोगियों के लिये लाभकारी नहीं हो सकता है । गलत व्यायाम से कमर दर्द दुबारा हो सकता है और उसकी तीव्रता बढ सकती है । कमर दर्द के रोगी के व्यायाम उसकी मांसपेशियों की शक्ति , लंबाई,  जोडों के अकडन की दिशा और प्रवृति आदि के आधार पर निर्धारित किये जाते हैं। जिसके लिये संपूर्ण रीढ, कुल्हे तथा घुटनों की पूरी चिकित्सकीय  जाँच  आवश्यक होती है। बगैर इनका ध्यान रखे व्यायाम शुरू करने से कई बार विपरीत प्रभाव पडते हैं तथा रीढ़ की अव्यवस्थित इंजीनियरिंग और बेतरतीब हो जाती है।  चिकित्सकीय व्यायाम हमेशा किसी कुशल फिजियोथेरापिस्ट  के निर्देशन में शुरु किये जाने चाहिये  । इसके अलावा कमर दर्द के मरीज को ये व्यायाम उस समय तक करते रहने चाहिए जब तक पेशियां और जोड सामान्य अवस्था में वापस न आ जाएं आमतौर पर इसमें 3 से सेंकेंड महीने का समय लगता है। मगर अधिकांश मरीज दर्द कम होने बाद ही व्यायाम छोड देते हैं और उनकी चिकित्सा अधूरी रह जाती है ।  
व्यायामों  के साथ-साथ कामकाज के दौरान अपनायी गयी मुद्राओं और दैनिक कार्यों के करने के ढंग का विश्लेषण भी आवश्यक है क्योंकि  मुद्रा कमर दर्द का एक महत्वपूर्ण कारण  है। रीढ की इंजिनियरिंग से अनभिज्ञ होने के कारण अपने दैनिक कार्यों में हम अनजाने में ही रीढ को लगातार चोट पहुँचाते रहते हैं । ।  कोई भी मुद्रा जिसमें रीढ की वक्रता सामान्य से अधिक या कम हो तथा जिसे बनाये रखने में अधिक प्रयास की आवश्यकता हो  कमर दर्द के रोगियो के लिये हानिकारक होती है ।मुंह धोते समय बेसिन के आगे झुकना एक ऐसी ही मुद्रा का उदाहरण है। इन हानी कारक मुद्राओं के अलावा ज्यादा देर तक किसी भी मुद्रा में रहना जोडों की सतह और डिस्क पर कुप्रभाव छोडता है । 
एक ही स्थिति में लगातार रहना मासंपेशियों के शक्ति संतुलन को प्रभावित करता है। इससे एक तरफ की पेशि दुर्बल तथा दूसरे तरफ की पेशियां संकुचित हो जाती हैं। किसी भी असंतुलित मुद्रा के लगातार प्रयोग से  मांसपेशियों के एक समूह को अधिक काम करना पडता है ,जिससे वे जल्दी थक जातीं हैं। इसके बाद शरीर का भार रीढ  के जोडों, उपास्थी  और लिगामेंट्स पर पड़ता है जिससे जोडों की लचक कम होती है तथा उनके क्षतिग्रस्त होने की संभावना बढ जाती है  । वहीं कुछ मांसपेशियों को काम ही नहीं करना पडता है और वे दुर्बल हो जाती हैं।  मांसपेशियों की दुर्बलता और जोडों की लचक कम होने से रीढ की भार वहन करने की क्षमता कम हो जाती है और सामान्य कार्यों मे पडने वाले भार से ही दर्द के तन्तु  उत्तेजित हो जाते हैं। इसके अलावा कोई भी मुद्रा अगर लंबे समय  तक कायम रखी जाये तो वह रीढ के जोडों की सतह  और डिस्क के पोषण में बाधक बन कर उनमें नकारात्मक परिवर्तन लाती है ।  अगर दर्द की अवस्था में रीढ पर  पडा भार मुद्रा परिवर्तन से  कम कर दिया जाये   तो बगैर दवाओं के भी दर्द कम हो सकता है ।
अतः पुराने कमर दर्द के मरीजों को दर्द पर मुद्राओं के प्रभाव को समझना बहुत जरूरी है। ताकि अपने दैनिक काम काज मे हानी कारक मुद्राओं के प्रयोग से बच कर दर्द विहीन रहा जा सके

सही मुद्रा के लगातार प्रयोग के लिये व्यक्ति के परिवेश का महत्वपूर्ण  प्रभाव होता है । घर आँफिस और रसोइ में  फर्नीचर, समान और उपकरणों की स्थिति में मामूली परिवर्तन करके हानिकारक मुद्राओं के उपयोग चा जा सकता है  तथा रीढ को अनावश्यक तनाव से बचाया जा सकता है। झुकना एक ऐसी क्रिया है जो बार-बार दोहराए जाने से एक सामान्य व्यक्ति में भी कमर दर्द पैदा  कर सकती है। कमर दर्द के  रोगियों को झुक कर काम करने ,खास कर झुक कर कोई भी भारी वस्तु उठाने  से बचना चाहिये । काम में आने वाली सारी वस्तुएं  यदि बैठने के स्थान से एक हाथ की परिधि  में ही रखें जाएँ तो  उनके उपयोग के समय झुकने  की आवश्यकता नहीं होगी ।   
भारी वस्तुओं को उठाते समय रीढ सीधी होनी चाहिये तथा नीचे-उपर उठने में कूल्हे  और घुटनों को मोडना  चाहिये। इससे सामान उठाते समय रीढ का भार घुट्ने और कुल्हे की पेशियों पर पडेगा । अच्छा तो यह होगा कि रसोई में भारी डिब्बे कमर की  उँचाई तक के खानों में रखी जाएं  तथा  हल्की वस्तुएं उपर और नीचे के खाने में  ताकि समान रखने में झुकने की आवश्यकता ही ना पडे । आलमारी की ऊँचाई इतनी होनी चाहिये जिससे बगैर एडी ऊँचकाए सबसे उपरी  सेल्फ़ से सामान निकाला जा   सके । अगर आलमारी बहुत ही ऊँची हो तो स्टुल पर खडा होकर काम करने से रीढ झुकने या खिंचने से बच जाएगी।   इससे सामान उठाते समय  रीढ पर अनावश्यक दबाव नहीं पडेगा ।झाडू लगान, पोंछा करना  ,बिस्तर पर चादर बिछाना और बच्चे को उठाना कुछ ऐसी क्रियाएं हैं जिसमें झुकने की जरूरत होती है। घरेलू उपकरणों की डिजाइन में किया सामान्य परिवर्तन  जैसे  लंबे हैंडल वाला झाडू पोंछा,  ऊँचा बिस्तर आदि कमर पर दबाव बढाये बिना  दैनिक कार्यो को आसान  बनाते हैं। लंबी हैंडल वाला झाडू पोछा  और रसोई में रखा एक स्टूल कमर दर्द से प्रभावित गृहणियों की समस्या काफी कम कर सकता है।

उसी प्रकार कुर्सी और गद्दे में किया गया मामूली परिवर्तन कमर दर्द को बार-बार होने से बचाता है। बैठते समय कुर्सी से पीठ सटी होनी चाहिये  तथा कमर के पीछे एक छोटा गद्दा रखना चाहिये । दोनों पैर जमीन पर पुरी तरह जमे हों तथा पैरों , जांघों और धड के बीच तकरीबन 90 डिग्री का कोण बनना चाहिये  । कमर दर्द के मरीज को हत्थे वाली कुर्सी क उपयोग करना चाहिये ताकि उठते समय शरीर को हाथों के सहारे से उठाया जा सके । 

इसके अलावा दिन भर मे कई बार रीढ को सारी दिशाओं में घुमाना चाहिये । इससे मांसपेशियों का संकुचन और जोडों पर पडा दबाव पुरी रीढ पर समान रुप से वितरित हो जाता है और किसी भी स्थान विशेष पर अत्यधिक मुद्रा जनित दबाव नहीं बन पाता है जो कि कमर दर्द का मुख्य कारण है । पाश्चात्य देशों में जहाँ रोगों के बचाव के कार्यक्रम पर ज्यादा जोर दिया जाता है, कमर दर्द के रोगियो को विशेष क्लासों में दैनिक कार्यों के समय रीढ के सही उपयोग करने के तरीकों का प्रशिक्षण दिया जाता है । यह संकल्पना बैक स्कूल के नाम से जानी जाती है। इसमें रोगी को  रीढ की संरचना , इंजिनीयरिंग तथा कमर दर्द को प्रभावित करने वाली मुद्राओं और तकनीकों की जानकारी दी जाती है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि  बैक स्कूल में भाग लेने वाले 50-60 % लोगों में दुबारा कमर दर्द की शिकायत नहीं होती है। 

ये  सामान्य उपायों कमर दर्द से छुटकारा  पाने में काफी प्रभावी सिद्ध हुए हैं । मगर अधिकांश मरीजों के लिये इन उपायों को अपनाने का अर्थ होता है जीवन भर की आदतों में बदलाव लाना जो कि अपने आप में एक आसान काम नहीं होता ।  मगर लगातार पीडा को झेलने तथा पीडानाशक  दवाओं के अत्यधिक उपयोग के  कुप्रभावों से जूझने से तो कहीं ज्यादा अच्छा है कि अपने जीवन शैली में ही थोडा बदलाव ला कर ही कमर दर्द से निपटा जाए   ।   ( 2055 शब्द)   
  



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