कोरोना : अब डराओ ना





       

कोरोना : अब डराओ ना

विनाश का भय विनाश से अधिक पीडादायक होता है । दुर्घटना से भारी पडता है दुर्घटना का डर। एक अदृश्य वायरस से होने वाले विनाश का डर इस समय पूरे विश्व पर हावी है । जनवरी के अंत से ही संपूर्ण विश्व कोरोना  महामारी के खतरों की विवेचना कर रहा है और तीन महीने बीत जाने के बाद भी इस भय से कोई मुक्ति मिलती नजर नहीं आ रही है। न तो इस बीमारी के लक्षणों के बारे में कोई  स्पष्टता  है और न ही कोई  निश्चिंत इलाज ।  टीके की चर्चा जोरों पर है मगर टीका अभी पहुँच से काफी दूर है।

इस बीच  दुनिया जैसे रुक सी गयी है। सब कुछ बंद। दुकान, उद्योग, हस्पताल, स्कूल, कालेज, दफ्तर, रेल, बस, जहाज।  रोजगार, कमाई, तनख्वाह । केवल नहीं हो रहा है बंद कोरोना का फैलाव और भूख का सितम ।

   जिस प्रकार का भय का वातावरण सृजन करने का काम  विश्व स्वास्थ्य संगठन, विशेषज्ञ  या सरकारें कर रहीं हैं वह सही है ?  इसके फैलाव की दर नि:संदेह बहुत अधिक है । मगर क्या यह अन्य बिमारियों की तुलना में ज्यादा खतरनाक भी  है?

 किसी भी बिमारी में भय के तीन  कारण हो सकते हैं - मौत , तकलीफ और  विकृति।

पहले  मौत को देखते हैं।  इसकी मृत्यु दर 2-6 % है । यानी सौ मे से 98 से 93 लोग बच गये हैं। प्लेग की मृत्यु दर 90 से 95 % होती है। अगर समय पर इलाज न हो तो हैजा 50 से 60 % की जान ले लेता है । बैक्टिरियल  मेनिंजाइटिस  की मृत्यु दर 50 % है। यहां तक की नये आये संक्रामक रोग जो कि- चीन से ही सारे दुनिया में  - सार्स और मार्स  - की  मृत्यु दर भी 30 और 10 प्रतिशत है । कहने का अर्थ कि बिमारी से होने वाले पहले भय  मौत के पैमाने पर कोरोना अन्य बिमारियों के मुकाबले कमजोर साबित होता है ।
 कोरोना से मरने वालो का प्रतिशत भारत में तो तीन  प्रतिशत  से ज्यादा  बिलकुल नहीं  है । यानि अगर 100 लोगों में संक्रमण है  तो 2-3  लोग मरे हैं ।  मगर जो मरे हैं उन्हें और बीमारियाँ भी  थीं । सच तो यह है कि जिन्हें इस बीमारी मरा बता जा रहा है उनमें से अधिकांश किसी न किसी अन्य  गंभीर बीमारी से  पहले ही प्रभावित थे ।हाँ यह जरूर है कि अगर उन्हें इस संक्रमण ने ना जकडा होता तो शायद वे जीवित होते । या शायद नहीं ?  

हर रोज क्रिकेट मैच के स्कोर की तरह आंकडे  बताये जा रहे हैं । 1 लाख , 1 लाख पचीस हजार   दो लाख , दो लाख पच्चीस हजार , तीन लाख प्रभावित लोग  ।

अरे जो ठीक  हो गये  उन्हें तो घटा दो । या जो  एक बार हो गया वो हमेशा कोरोना ?  हम  कहीं जाने अनजाने में भूतपूर्व कुष्ट रोगियों की तरह भेदभाव कि एक नयी श्रेणी तो नहीं बना रहे हैं इसको जीवन पर्यन्त अवहेलना का दंश झेलना पडेगा ?   

 बहरहाल मगर मुश्किल तो ये है कि मौत के इन  आंकडों में भी डराने  वाली तासीर  नहीं है अगर  दूसरे कारणों से मरने वालों और प्रभावितों की संख्या पर नजर दौडायें।  तपेदिक से हर साल चार लाख भारतीय मर जाते हैं यानि हर रोज तकरीबन बारह सौ से भी ज्यादा। तपेदिक की मृत्यु दर तकरीबन 20 प्रतिशत है । और हमारा व्यवहार क्या है । सरकार  को कार्यकर्ता लगा के दवाइयाँ खिलवानी पडती हैं । डोट्स।  दिल की बीमारियों के कारण  हर रोज तक़रीबन चार सौ से पांच सौ लोग काल-कलवित होते हैं । आप कह सकते हैं ये तो क्रानिक बीमारियाँ हैं, धीरे- धीरे होती है। आदमी अपनी ज़िंदगी तो जी ही लेता है । यानि एकदम से मौत तो नहीं होती ।  ठीक बात ।

 मगर सडक हादसों में मरने वालों का क्या । यहां तो एक दम से जान चली जाती है  सडक हादसों में  । 2018 में एक लाख पचास हजार लोग मरे थे सडक हादसों में और करीब पौने पांच लाख गंभीर रूप से घायल ।  यानि  हर रोज चार सौ दस  मौत और तेरह सौ गंभीर रूप से घायल । और समाज क्या करता है ?  हैलमेट पहनने  और सडक यातायात  सुरक्षा के कडे  कानून का तीखा विरोध । पुलिस के चालान के डर से हैलमेट का प्रयोग । हम सचमुच चिंतित हैं क्या जीवन बचाने में ?


कोरोना से कथित मृत्यु के मामलों में भी पोस्ट-मार्टम भी करने की मनाही है।  माना संक्रमण का खतरा है मगर 10 ,20 ,50 लोगों के पोस्ट-मार्टम तो किये ही जा सकते हैं । मौत के कारण का पता तो चले । या बस अंधेरे में ही तीर चलाये जाते रहा जाये ।

कहीं अन्य  बिमारियों के कारण होने वाली मौतों को भी तो कोरोना के मत्थे नहीं मड दिया जा रहा । भय के वातावरण को कायम रखने के लिये । अंधेरा कायम रहे ।  


अब  दूसरे  भय यानि तकलीफ की बात करें तो जो बचे हैं उनकी जिंदगी कैसी है ? क्या वे किसी लम्बी तकलीफ या विकृति से प्रभावित हैं ?  80 % मामलों में कोरोना सेल्फ़ लिमिटिंग यानी अपने आप ठीक होने वाला रोग है। सर्दी खाँसी मामुली बुखार  से तो हम अक्सर प्रभावित रहते हैं । डेंगु और चिकनगुनिया में शरीर में तेज बुखार होता है शरीर टूटता है । मलेरिया व्यक्ति  को अशक्त बना देता है।  कोरोना से ऐसी कोई बात अभी तक तो सामने नहीं आई । हाँ मिस कोरोना कपूर  और  कोरोना पोजिटिव  होने के कारण क्वारेन्टाइन किये लोगों के हंसते गाते, हंगामा करते विडीयो हमने जरूर देखे । अब अगर कोई बीमार  होगा,  गंभीर पीडा होगी तो क्या वह नाचे गायेगा ? हंगामा मचायेगा । साफ है  आदमी को कोई तकलीफ नहीं है और सारा स्वास्थ्य विभाग उसे न सिर्फ गंभीर बीमारी से प्रभावित बता रहा है बल्कि उससे वैसा ही व्यव्हार करने की उम्मीद भी लगाये बैठा है । जो कि हो नहीं रहा है ।

 दरअसल कोरोना पोजिटिव लोगों से जो व्यवहार हो रहा है तकलीफ उससे ज्यादा है । संक्रमण की तकलीफ तो फिर भी झेली जायेंगी । मगर जो सामाजिक बहिष्कार हो रहा है, अस्पतालों में ही छुआ-छूत बरती जा रही है । डाक्टर, नर्स देखने  नहीं  आ रहे । खाना नहीं मिल रहा है। टायलेट की सुविधा गंदी है।   परेशानी उससे है ।

अब भय के तीसरे मानदंड  विकृति पर  आते है ।  इस बिमारी के कोई लंबे प्रभाव हैं इसका कोई प्रमाण अभी तक नहीं मिला है । मिल भी नहीं सकता । क्योंकि  बिमारी भी केवल 5 महिने पुरानी है। मगर जो ठीक हो चुके हैं उनसे भी  कोई भी ऐसा संकेत नहीं मिला  जिससे ये पता चल पाये कि उन्होंने आगे कोई खतरा होने वाला है।

पोलियो भी मामूली बुखार और दस्त करता था मगर उसके बाद होने वाली पैरालिसिस जीवन भर प्रभावित करती है। टीबी के आरंभिक लक्षण मामूली होते हैं मगर बाद के दिनों में यह खतरनाक  समस्याओं को जन्म देती है । कुष्ट रोग के लक्षण तो और भी कमजोर होते है मगर बाद में होने वाली विकृति का दन्श जीवन भर भुगतना पडता है ।  गोरखपूर के इंसेफलाइटिस के बच्चे बुखार के बाद चलने- फिरने की समस्या से जूझ रहे हैं ।

 मजे की बात है कि 70 -80 प्रतिशत लोग ठीक  हो रहे  है । बहुतों में तो बिमारी के कोई लक्षण भी नहीं है। एसिम्टोमेटिक पेशेंट । जब सिमटम ही नहीं तो पेशेंट कैसा ?  अब तो रिकवरी रेट भी बढती जा रही है। सवाल है कि जब इलाज नहीं तो ठीक कैसे हो रहें है ? इलाज के अभाव के कारण या इलाज के बावजूद ।  

अब एक दूसरे तर्क पर आते हैं समझने में कठिन है । पर है भारतीय संस्कृति  का आधार । मनुष्य कितना जीये।  अथर्ववेद का ॠषि  कामना करता है जीवेत शरद: शतम । यानी सौ साल  बस ।  2011 की जनगणना के मुताबिक भारतीयों का औसत जीवन 66 वर्ष का है । 1951 में यह 31 वर्ष था । कोरोना से मरने वाले अधिकांश इस आयु से ऊपर के हैं ।

 महाभारत में यक्ष प्रश्न है । हे युधिष्टिर संसार का सबसे बडा आश्चर्य क्या है ?  उत्तर  मिला हम हर रोज बहुत सारे लोगों को मरते हुए देखते है मगर समझते हैं कि मृत्यु हमें नहीं आयेगी।

 और फिर भारतीय दर्शन मृत्यु से भय न करने की शिक्षा देता है । हम तो शरीर के नश्वर  और आत्मा के शाश्वत होने की बात करने वाले हैं  । महाभारत युद्ध के आरंभ में अर्जुन को भी यही भय था । कृष्ण ने  दो बातें कहीं  - पहली कि शरीर मरता है आत्मा नहीं मरती । दुसरी अगर शरीर मरता है तो फिर जन्म भी लेता है । जो जन्मा है वह मरेगा और जो मरा है वो फिर जन्मेगा । और अगर वो नहीं जन्मा तो मोक्ष की प्राप्ति करेगा । हमारे सारे धर्म शास्त्र  इसी मोक्ष प्राप्ति के लिये ही तो हमें उकसाते हैं ।  सारांश यह कि मरने से क्या डरना ।
       मौत आनी है आयेगी एक दिन
जान जानी हैं जायेगी है एक दिन
 ऐसी  बातों से क्या घबराना …।

यही बात मैने अपने एक मित्र को कही। उसने कहा-  अपने बीबी बच्चों को यही बोल के दिखा और साथ में ये भी बताते जाना कि बच्चे के स्कूल की फीस और राशन का उधार इस जन्म का शरीर ही चुकायेगा  या अगले जन्म वाला । और जो अगर  मोक्ष प्राप्त हो गया तो पैसे लेने बैकुंठ जायेंगे क्या ।  
                                    
  इसीलिये मरने वालों की संख्या विचलित  करती है। मान लें कि भारत की केवल एक प्रतिशत आबादी ही कोरोना के गाल में समा जाय तो भी यह संख्या एक करोड तीस लाख के करीब हो जायेगी। मतलब इन तमाम आंकडों और तर्कों की बाजीगरी के बावजूद संकट तो है ही।  

मगर किया क्या जाये ?  तालाबंदी --- । बैठ जाये एक बार फिर घर के अंदर । रोक के संसार के चक्र को ।  मगर कितने दिन । पिछली तालाबंदी और मजदूरों में मचे हाहाकार  की तस्वीरें तो अभी ताजा हैं । अगर तालाबंदी और चली तो यही संकट सब पर आने वाला है । स्कूल नहीं खुलेंगे तो बच्चे फीस क्यों दें, फीस न मिले तो शिक्षकों की तनख्वाह कैसे दी जायेगी? बंद रहे होटलों के कर्मचारियों का क्या होगा? बंद पडी औद्योगिक इकाइयों और उनसे जुडे अनेक प्रतिष्ठानों से जुडे लोगों का क्या होगा? बाजार में ग्राहक नहीं आयेंगे तो सामान कैसे बिकेगा? दुकान कैसे चलेगी?
  कह रहे हैं कि यह साल कमाने का नहीं  खाने का है । अपनी जमापूंजी के सहारे एक साल गुजारो । कितनों के पास है यह क्षमता ?  कोई भी सरकार  क्या अपने सारे नागरिकों को एक साल बैठा के खिला सकती हैं ?

  और अगर हां तो यक्ष प्रश्न तो फिर भी खडा ही रहेगा । क्या एक साल में कोरोना से मुक्ति मिल जायेगी ? क्या इसका टीका तैयार हो जायेगा ? एड्स का टीका तो अभी तक नहीं बना। दुनिया के सबसे प्राचीन रोग कुष्ट का सामना भी दुनिया बगैर टीके के ही करती आ रही है।

अब प्रश्न है कि भूख से मरें या कोरोना से । कोरोना सौ में से अधिक से अधिक पांच या छ:  को मारेगा । भूख सौ में से 80 -90 को तो मारेगी ही । फैसला अब हमारे हाथों में है । एक  तबका तालाबंदी की वकालत करेगा और दुसरा  तालाबंदी खोलने की । दोनों  के अपने-अपने तर्क होंगे । जबर्दस्त एक से बढ कर एक, अकाट्य । सरकार किसकी सुनेगी ?

मगर इससे ज्यादा ज़रुरी है यह जानना  कि आम आदमी किसकी सुनेगा?  कोरोना से अब तक हो रही लडाई ठीक  वैसे है जैसे एक पिता अपने बेटे की परीक्षा की तैयारी करवा रहा हो। । यह करो वह करो । कई बार तो उत्तेजना में पिता ही पाठ याद करने लग जा रहा है ।  मगर बच्चे को इन सबकी अहमियत समझ में आ ही नहीं रही।  पिता डरा रहा है  और  बच्चा डर ही नहीं रहा।  अब जब तक बच्चा इसे गंभीरता से नहीं लेता सारे प्रयास  तो व्यर्थ होंगे ही । 

सरकारें भी यही कर रही हैं । मास्क पहनो नहीं तो जुर्माना लगेगा । अब हम खुद को बिमारी से बचाने के लिये नही बल्कि जुर्माने बचने के लिये मास्क पहन रहे हैं । सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। जहां निगरानी से बाहर हुए फिर से अपनी पुरानी चाल । मास्क ठोढी पर और धक्कम- धुक्की चालू । आखिर इस देश में कितने लोग हैलमेट पहनते हैं स्वेच्छा से ? फिर ये उम्मीद रखना कि लोग अपने- आप कोरोना के सुरक्षा के सारे उपाय करेंगे जरूरत से  कहीं ज्यादा  है ।

तो दुनिया तो वैसे ही चलेगी जैसे चलती है। अब विकल्प क्या है । मुझसे पूछें तो मेरे दो मंत्र है । एक - न अपना नुकसान न होने दें  और दो-  न दूसरे का नुक़सान करें ।

अपना नुकसान न करें । संक्रमण से बचने के सारे जतन करें । शरीर में जीवाणु, विषाणु, कीटाणु आदि के घुसने के छ: रास्ते हैं - चमड़ी, आँख, नाक, मुँह, ऊँगलियों और पैर । इन पर पहरा लगायें । मास्क प्रयोग, यानी नाक और मुँह  को ढक कर रखने, से वायु मार्ग में भ्रमण करने वाले जीव या धूल के कण फेफडे में नहीं जा पायेंगे । हाँ मास्क को ठोढी के उपर लटकाने से कुछ नहीं होगा ।

खाने से पहले या किसी भी पवित्र वस्तु को छूने के पहले हाथों को धोना जरूरी है। बचपन से सिखाया जाता रहा है । मगर हम हैं कि सीख कर भूल जाते हैं। अब तो सारी वस्तुएं ही पवित्र हैं । किसी को भी कुछ देने और किसी से कुछ लेने के बाद हाथों का स्पर्श साबुन और पानी से जरूर कराएं । सैनिटाइजर की जरुरत तो तब होगी जब साबुन और पानी नही होगा।  हाँ कहीं  ऐसा न हो कि घर बैठे- बैठे हाथ ही धोते चले जाएं । अगर आपके घर में कोरोना का प्रवेश नहीं हुआ है तो इसकी जरूरत नहीं है ।

जूते पैरों को चोट से बचाते हैं, गंदगी से बचाते हैं । मगर साथ-साथ बाहर की धूल, गंदगी और उसमें रहने वाले जीव जन्तुओ को भी घर में लाते हैं । जूते को घर के बाहर ही उतारें  और साथ ही साथ घर के अंदर पहनने वाले चप्पलों को भी घर से बाहर न जाने दें । मेरी दादी अपनी रसोई में किसी को भी जूते-चप्पल पहन के आने की इजाजत नहीं देती थीं।

 जीवाणु कपडे से भी चिपक सकते हैं और घर के अंदर आ सकते हैं । कपडों के दो सेट रखे जायें - एक बाहर के लिये और दूसरा घर के अंदर के लिये । बाहर के कपडों को जहां तक हो सके घर की दहलीज ना लांघने दिया जाय। और कपडे उतारते समय थोडी सावधानी बरती जाये। कपडे उतारते  समय बाहरी सतह को न छुआ जाये । यही बात मास्क पर भी लागू होती है। और अगर ऐसा हुआ तो हाथ धोना  पडेगा । इससे तो अच्छा ये है कि बाहर से आने के बाद नहा- धो के स्वच्छ कपडे पहन कर ही घर वालों से मिला जाये।  इन्हें सूतक के नियम कहते हैं  - सूतक, छुतका या आधुनिक  एकांतवास  [सोशल आइसोलेशन]  आपकी मर्जी जो कहें । संक्रमण रोकने के प्रभावी तरीका तो है ही ।

हम दूसरों का नुकसान न करें। आत्मवत सर्व भूतेषु य: पश्यति स पंडिता:। अपने जैसे दूसरों को भी देखो। मानव से मानव में फैलने वाला रोग है । हम संक्रमित भी हो सकते हैं और दूसरों में संक्रमण फैला भी सकते हैं । वे सारे उपाय जिससे हम संक्रमण से बच सकते है लगभग वही उपाय दूसरे को भी हमारे द्वार हो सकने वाले संक्रमण से बचा सकते हैं । मास्क को ही ले लें । नाक मुँह ढकने से बाहर के कीटाणु शरीर में नहीं आयेंगे । अपने शरीर वाले भी  तो बाहर नहीं जा पायेंगे। आखिर बोलने, छींकने, खाँसने से जो थूक का फुहारा निकलता है उसे भी तो रोकना आवश्यक है।
जूते केवल अपने घर के बाहर ही नहीं दूसरे के घर के बाहर ही उतारें । जहां तक हो सके दूसरे घरों में प्रवेश से बचें । बातचीत सडक पर भी हो सकती है। हाथ न मिलाये गले ना मिलें  दूर से ही हाथ जोडें ।

 बकौल बशीर बद्र थोडे बदलाव के साथ  
 
कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से,
 ये बडे मिजाज का दौर है जरा फासले पे रहा करो।






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