याचना

याचना
                                                             - गौरांग 
-1-
शांति की आकांक्षा का
कष्ट दारुण चाहता हुँ
आज मैं भगवान से अपने लिये
कुछ मांगता हुँ


शब्द मेरे ही बने अंगार
मुझ पर आ गिरे
अवहेलना के दंश का अभिशाप
भी सहना पडा
कर्म की गति
धर्म का वरदान
मेरा मर्म क्यों क्रुर हो गया
कुछ बंधनों को काटने की होड में
काटता  सबको गया

वे कान जिसमें गीत के स्वर गूँजते  थे
गोलीयों की ताल क्यों सुनने लगे
विश्रांत पल का शोर
बहरा कर गया शायद
निर्मोही निर्मम सा खडा
सुनता रहा मैं
अश्रुमय निर्बल जनों की
मौत का संगीत


स्वर मिले तो बोल देंगी
वादियाँ निर्भीक लतायें
रक्तमय  इतिहास के निर्माण का कारण
क्रांति की असमर्थता
की ग्लानि से  सुखा हुआ मन
शांति की संवेदना से
भींग जाना चाहता है
आज कोई
मौत की अनजान गलियों में भटकना चाहता है
बंधनों को तोड
मैं भी आज उसके साथ
 जाना चाहता हूँ
आज मैं भगवान से अपने लिये
 कुछ मांगता हूँ



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